Thursday, 23 August 2018

स्थूल से सूक्ष्मता की ओर

स्थूल से सूक्ष्मता की ओर

सफल विपश्यी साधक चार सूक्ष्मताओं की चरमसीम सच्चाइयों का साक्षात्कार कर लेता है। चार परम सत्य का स्वयं साक्षात्कार कर कृतकृत्य हो जाता है।
पहली सूक्ष्मता है काया की । कायानुपश्यना करता हुआ साधक प्रारंभ में काया के ठोसपने की अनुभूति करता है। बार-बार के अभ्यास से स्थूल से सूक्ष्मता की ओर बढ़ता है। बीधते हुए तीक्ष्ण चित्त से ऊपर से नीचे की ओर तथा नीचे से ऊपर की ओर यात्रा करते-करते स्वतः शरीर का घनत्व नष्ट होता है। फिर इसी तीक्ष्णता से समग्र शरीर-पिंड को चीरता हुआ केवल ऊपरी-ऊपरी सतही स्तर तक ही नहीं, बल्कि भीतर तक की घनसंज्ञा नष्ट कर लेता है। रूप कलाप याने शरीरगत परमाणुओं की सूक्ष्म सच्चाई तक जा पहुँचता है। जो भौतिक जगत का अंतिम सत्य है। शरीर का एक-एक कण खुल जाता है। कहीं भी संकलन, संघटन, संयोजन, संश्लेषण नहीं रह जाता। जैसे कोई बालू का गीला पिंड सूख जाय । कण-कण को बांधे रखने वाली संयोजनरूपी नमी दूर हो जाय। घनीभूत पिंड विघटित हो जाय, बिखर जाय। शरीर के बाहर-भीतर कहीं भी कोई स्थिर, शाश्वत, ध्रुव, अचल, ठोस पदार्थ है, ऐसा भ्रम नहीं रह जाय। यही रूप-स्कंध की याने भौतिक रूप की अंतिम सच्चाई तक पहुँचना है। यही रूप का सूक्ष्मतम साक्षात्कार है जिसमें कि भासमान प्रकट सत्य परमसत्य के रूप में अनुभूत होने लगता है।

दूसरी सूक्ष्मता है - वेदना-स्कंध की। विपश्यी साधक वेदनानुपश्यना करता हुआ देखता है कि प्रारंभ में समस्त शरीर पर अधिक तर स्थूल-स्थूल संवेदनाएं महसूस होती हैं। जैसे कि घनीभूत दबाव, दुखाव, तनाव, खिचाव, भारीपन अथवा मूळ, अर्धमूळ आदि-आदि। परंतु शांत और समता भरे चित्त से इन स्थूल संवेदनाओं का साक्षीकरण करते-करते इनका स्वतः भेदन होने लगता है। शनैः शनैः शरीर के भीतर-बाहर सर्वत्र स्थूल संवेदनाएं क्षीण होने लगती हैं। उनका विघटन-विश्लेषण होने लगता है और एक अवस्था आती है जबकि शरीर पर कहीं भी मूर्छा या अर्धमूर्छा नहीं रह जाती। कहीं कोई सघन संवेदना नहीं रह जाती। सर्वत्र तरंगें, उदय-व्यय ही उदय-व्यय की अनुभूति होने लगती है। अनासक्तभाव से इसी का दर्शन करते-करते संवेदना की यह उदय-व्यय अनुभूति भी अधिक सूक्ष्मता की ओर प्रयाण करने लगती है और सूक्ष्मतम अवस्था तक पहुँचती है। तब उदय और व्यय की अलग-अलग अनुभूति भी बंद हो जाती है। उदय होते ही व्यय होता है। बीच की स्थिति ही समाप्त हो जाती है। यह परमाणुओं से चित्त का स्पर्श होते ही वेदना की उत्पत्ति की सूक्ष्मतम सच्चाई है, जो तत्क्षण व्यय में बदलती है। इस अवस्था में सारा प्रपंच इस तीव्रगति से प्रवाहमान प्रतीत होता है कि सर्वत्र भंग ही भंग का बोध होता है। जैसे बहती हुई नदी बालू के तटवर्ती कगार को काट दे और वह बालू का ढेर भरभरा कर गिर पड़े। कण-कण बिखर जाय। यों सारे शरीर-स्कंध पर जो संवेदना महसूस होती है। वह अत्यंत तीव्रगति से भंग होती हुई, बिखरती हुई ही महसूस होती है। कहीं ठोसपना नहीं, स्थूलता नहीं। कहीं अटकाव नहीं, व्यवधान नहीं, रुकावट नहीं, बाधा नहीं । सर्वत्र धारा-प्रवाह की ही अनुभूति होती है। यह भंग बोध ही संवेदना की सूक्ष्मतम अवस्था का साक्षीकरण है जो संवेदनाओं को सामिष नहीं बनने देता याने उनके प्रति राग-द्वेष नहीं जगने देता; जो संवेदनाओं को निरामिष बनाए रखता है याने उनके प्रति अनासक्तभाव पुष्ट करता है।

इसी प्रकार विपश्यी साधक चित्तानुपश्यना करता हुआ, चित्त के उस खंड के क्रिया-कलाप को देखता है जिसे संज्ञा कहते हैं। जिसका काम मूल्यांकन करना है। पूर्व अनुभूतियों और यादगारों के बल पर, पूर्व संस्कारों के रंगीन चश्मे चढ़ाए हुए चित्त का यह संज्ञा-स्कंध प्रत्येक अनुभूति को अच्छा या बुरा, प्रिय या अप्रिय, सुखद या दुःखद आदि-आदि मूल्य देते रहता है। साधक देखता है। कि यह संज्ञा-स्कंध कितना प्रबल है। प्रत्येक अनुभूति अच्छे-बुरे मूल्यांकन से जुड़ी ही रहती है। जिस अनुभूति को अच्छी मान लेता है उसे लगातार कितने अरसे तक अच्छी माने जाता है। जिसे बुरी मान लेता है उसे लगातार कितने अरसे तक बुरी ही माने जाता है। तारतम्य टूटता ही नहीं। संज्ञा की निरंतरता बनी ही रहती है। परिणामतः संज्ञा-स्कंध घनीभूत होते जाता है। विपश्यना के बल पर साक्षीकरण का अभ्यास करते-करते साधक देखने लगता है कि किस प्रकार घनीभूत संज्ञा के कारण ही प्रतिक्रियाओं से अभिभूत चित्त राग-द्वेष के नए संस्कार बनाता है और दूषित हो उठता है। और कैसे जब संज्ञा की निरंतरता टूटती है तो सघनता दुर्बल होती है। स्थूल से सूक्ष्म होती हुई संज्ञा की जकड़ कम होती है तो प्रतिक्रियाओं का प्रभाव भी स्वतः कम होने लगता है।

इसी प्रकार चित्तानुपश्यना के साथ-साथ साधक धम्मानुपश्यना भी करने लगता है। रूपकलापों याने परमाणुओं के धर्म-स्वभाव को देखता है। वेदनाओं के धर्म-स्वभाव को देखता है। और देखता है संज्ञा और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हो रहे संस्कारों के धर्म-स्वभाव को भी, कैसे शरीर पर होने वाली किसी संवेदना के अनुभव का संज्ञा जब अच्छा, प्रिय, सुखद आदि मूल्यांकन कर देती है तो तुरंत रागात्मक संस्कार जागने लगते हैं, और घनीभूत होने लगते हैं। उसका बुरा, दुखद, अप्रिय मूल्यांकन कर देती है तो द्वेषात्मक संस्कार उभरने लगते हैं और घनीभूत होने लगते हैं। इन घनीभूत संस्कारों का तूफान ही भावावेश बन कर समस्त चित्त-स्कंध पर छा जाता है और चित्तधारा को व्याकुल-व्यथित कर देता है। साधक विपश्यना के आधार पर समझता है कि ये संस्कार कितने दुःखप्रद हैं। विपश्यना द्वारा ही इसके दु:खद होने का कारण भी समझ में आने लगता है। इन संस्कारों के प्रति कितना तादात्म्य स्थापित कर लिया है -आत्मभाव, आत्मीय भाव; 'मैं' का भाव, 'मेरे' का भाव। यही आसक्ति पैदा करता है। परिणामतः दुःख पैदा होता है। विपश्यी साधक को देखते-देखते स्पष्ट होने लगता है कि यह 'आत्म-आत्मीय' भाव, 'मैं-मेरे' का भाव, रूप-स्कंध या शरीर-स्कंध के प्रति याने घनीभूत परमाणुओं के पुंज के प्रति कितना गहन हो उठा है। फलतः दु:ख भी उतना ही गहन हो उठा है। विपश्यना द्वारा सत्य का साक्षात्कार करते-करते यह स्पष्ट होने लगता है कि जिस प्रकार रूप-सकंध याने परमाणु-पुंज उदय-व्यय स्वभाव के हैं, अनित्यधर्मा हैं, वैसे ही वेदना भी, वैसे ही संज्ञा भी और वैसे ही संस्कार भी। यह अनित्य-बोध जितना-जितना सबल होते जाता है, संस्कारों के प्रति 'मैं-मेरे' का भाव उतना-उतना दुर्बल होते जाता है, आत्मभाव दुर्बल होता है तो अनात्मभाव स्वतः पुष्ट होता है। देखते-देखते आसक्ति क्षीण होती। है। अनासक्ति पुष्ट होती है। दुःख का कारण दूर होता है। दुःख दूर होता है।

अनात्मभाव पुष्ट होता है तो ही संज्ञा का घनत्व क्षीण होता है। संस्कार का घनत्व क्षीण है। दर्शन "केवल दर्शन" बन जाता है। ज्ञान केवल ज्ञान" बन जाता है। भोक्ता और कर्ता की भ्रांति तो दूर होती ही है; समय पाकर द्रष्टा और ज्ञाता की भ्रांति भी दूर हो जाती है। "देख रहा हूँ" के स्थान पर देखा जा रहा है" रह जाता है। "जान रहा हूँ" के स्थान पर "जाना जा रहा है" रह जाता है। दर्शक ,दर्शन और दृश्य तीनों एकाकार होकर "केवल दर्शन" रह जाता है। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों एकाकार होकर "केवल ज्ञान" रह जाता है। यही सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान की चरम अवस्था है। ऐसी अवस्था में ही संज्ञा-निरोध होता है। साधक आध्यात्म की गहनतम अवस्था प्राप्त करता है। केवल ज्ञान, केवल दर्शन से "कैवल्य" की उपलब्धि करता है। "केवली" हो जाता है। इंद्रियातीत परमपद "निर्वाण" में यथेच्छ रत रहने में अभ्यस्त हो जाता है। उन्मुक्त हो जाता है। तब वह स्वयं जान लेता है कि अब मेरा पुनर्जन्म नहीं है क्योंकि उस अवस्था में पहुँच कर पुनर्जन्म के सारे भव-संस्कार क्षीण होकर क्षय हो जाते हैं। मनुष्य-जीवन सफल-सार्थक हो जाता है। संस्कार और संज्ञा के उदय-व्यय की अनुभूति से लेकर उनके निरोध तक की यह यात्रा ही इन दोनों की चरम सूक्ष्मतम अवस्था है। विपश्यी साधक यों रूप, वेदना, संज्ञा और संस्कार-स्कंधों की उन सूक्ष्मतम परम सच्चाइयों की अवस्थाओं का साक्षात्कार कर लेता है, जिनके आगे इन स्कंधों के क्षेत्र में कुछ और सूक्ष्मतर नहीं रह जाता। तदनंतर इनसे परे उस परम सत्य निर्वाण का साक्षात्कार करता है जो कि इंद्रियातीत है, नाम-रूपातीत है। साधक प्रत्यक्षानुभूति द्वारा भलीभांत जान लेता है। कि स्थूल भासमान सच्चाइयों का भेदन कर सूक्ष्मतम तक पहुँचने की यही विधा है, साधना है, शक्ति है। इससे बढ़ कर अन्य कोई विद्या, साधना, शक्ति नहीं। अतः इसे पाकर वह और कुछ पाने की अपेक्षा नहीं रखता।

अंतर्मुखी होकर विपश्यना साधना द्वारा स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा करने वाले साधक के लिए मार्ग में अनेक कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। अनेक बार भौतिक रूप और चित्त का घनत्व नष्ट होकर सूक्ष्म प्रवाह की स्थिति प्राप्त होने के बावजूद किसी सुसुप्त कर्म-संस्कार की उदीरणा होती है तो शरीर-स्कंध पर पुनः उस संस्कार के अनुरूप कोई स्थूल घनीभूत संवेदना प्रकट करती है, कभी मूछ-अर्धमूर्छा प्रकट करती है। साधक धीरज के साथ फिर उन्हें भासमान स्थूल प्रकट सत्य समझ कर साक्षीभाव से देखता है तो देर-सबेर उनका भी भेदन होता है -पूर्व संस्कारों की निर्जरा होती है,

उनक क्षय होता है। पुनः सूक्ष्म धाराप्रवाह की अनुभूति होने लगती है। यों जब तक अधोगति की ओर ले जाने वाले सुसुप्त कर्म-संस्कारों का संग्रह पूर्णतया समाप्त नहीं हो जाता, तब तक बीच-बीच में स्थूलता उभरती ही रहती है। समझदार साधक इन पूर्व संस्कारजन्य संवेदनाओं के प्रति उपेक्षा का अभ्यास करता है। यह संस्कार-उपेक्षा की यात्रा किसी के लिए लंबी, किसी के लिए ओछी होती है। निर्भर करता है - पूर्व-संग्रह कितना है! निर्भर करता है - संस्कार उपेक्षा का काम कितनी समझदारीपूर्वक किया जा रहा है!

ऐसी अवस्था में कोई कच्चा साधक राजमार्ग छोड़ कर किसी गलत भूल-भुलैया में पड़ जाता है। पूर्व संस्कारजन्य स्थूल भासमान सत्य प्रकट हो तो उसके वश की बात नहीं। उनका साक्षीभाव से सामना करना ही है। परंतु जब साधक बावलेपन में स्वयं कल्पनाजनित रूप, रंग, रोशनी, शब्द आदि का कृत्रिम आलंबन उत्पन्न करके उन पर ध्यान देने लगता है तो एक भासमान सत्य से दूसरे बनावटी भासमान सत्य के उधेड़-बुन में पड़ जाता है। सूक्ष्मता की ओर जाने का रास्ता रुक जाता है। राजमार्ग छूट जाता है। किसी अंधी गली में जा अटक ता है। मुक्ति दूर हो जाती है। साधक समझदार होता है तो इस धोखे से अपने आप को बचाता है।

इस साढ़े तीन हाथ की काया के भीतर समझदारीपूर्वक स्थूल सत्य से सूक्ष्मता की ओर प्रयाण और सूक्ष्मतम सत्य तक की पहुँच सब के लिए अत्यंत कल्याणकारी है । 

साधको! विपश्यना के सतत अभ्यास द्वारा सूक्ष्म से सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतर से सूक्ष्मतम की ओर गतिशील बने रहना सीखें, किसी भुलावे में भटके नहीं और इस प्रकार सही माने में अपना मंगल-कल्याण साधे! स्वस्ति-मुक्ति साधे!

कल्याणमित्र, 
सत्यनारायण गोयन्का

Thursday, 21 June 2018

🌷Seventy Years Have Been Completed 🌷 -S. N. Goenka.

आत्मकथन 
सत्तर वर्ष पुरे हुये 
Seventy Years Have Been Completed

जीवन ने सत्तर शरद देख लिये । और न जाने कितने बचे हैं। जो बचे हैं, उनका कैसे सदुपयोग हो? यही सजगता बनी रहे।
इस अवसर पर कल्याणी भगवद्-वाणी के कुछ बोल मानस में उभरते हैं। प्रसंग है श्रावस्ती के, अनाथपिंडक के जेतवनाराम का। समय है रात्रि का। कोई देवपुत्र भगवान से मिलने आया है। वह भगवान के सामने चार चरण की एक गाथा में अपने विचार प्रगट करता है -
अच्चेन्ति काला, तरयन्ति रत्तियो - समय बीतता जा रहा है, राते संरकती जा रही हैं। 
वयोगुणा अनुपुब्बं जहन्ति - उम्र क्रमश: खत्म होती जा रही है। 
एतं भयं मरणे पेक्खमानो- [आने वाली] मृत्यु के उस भय को देखते हुए, 
पुञानि कयिराथ सुखावहानि - सुखद फल देने वाले पुण्यों का संपादन करो। 

कहने वाले ने ठीक ही कहा। सचमुच - सुबह होती है, शाम होती है। उम्र यों ही तमाम होती है ॥
कहीं यह अनमोल मानवी जीवन यों ही व्यर्थ खत्म न हो जाय। भले आने वाली मृत्यु के भय से ही सही, पर सुखद फलदायी पुण्यकर्मों में ही लगे । पाप कर्मों का संपादन करेंगे, तो फलस्वरूप दुःखों का सामना करना होगा। पुण्य कर्मों का संपादन करेंगे, तो फलस्वरूप सुखों का सामना करेंगे । प्रकृति का यह अटूट नियम है। अतः पापकर्मों की अपेक्षा पुण्यकर्मों का संपादन उचित है। अकुशल की अपेक्षा कुशल का संपादन समीचीन है। दु:खों से बचने के लिए, सुख भोगने के लिए। परंतु इस सदा बदलते रहने वाले सुख-दु:ख, दुःख-सुख के लोक चक्र में न जाने कब से पिसते चले आ रहे हैं और यह सांसारिक सुख-दुःख का भव-भ्रमण आगे न जाने कब तक यों ही चलता रहेगा? भगवान ने इस भव-संसरण से सर्वथा विमुक्त हो जाने का सहज, सरल मार्ग ढूंढ निकाला। उसे सब के लिए सुलभ बनाया। लोगों को मुक्तिदायिनी विपश्यना विद्या सिखाई, जिसके अभ्यास से भव-मुक्त होकर इन अनित्यधर्मा, लोकियसुखों से कहीं श्रेष्ठ, नित्य, शाश्वत निब्बानं परमं सुखं यानि निर्वाण का परम सुख प्राप्त कर सकें , परम शांति उपलब्ध कर सकें । परंतु यह तभी संभव है, जबकि लोकिय सुख-भोग के पीछे बेतहाशा दौड़ लगाने वाली अभीप्सा का स्वभाव टूटे। और विपश्यना यही कराती है। अंतर्मन की गहराइयों में राग-द्वेष के संस्कारों को प्रजनन करते रहने का स्वभाव तोड़ती है। सुख के प्रति राग और दु:ख के प्रति द्वेष के संस्कारों का उत्खनन करती है। अंध-प्रतिक्रिया के दीर्घकालीन स्वभाव का उन्मूलन करती है। जब तक लोकिय सुखों के प्रति राग रहेगा, तब तक लोकिय दु:खों के प्रति द्वेष भी जागता ही रहेगा और इन दोनों के कारण लोक चक्र चलायमान ही चलायमान रहेगा। लोक चक्र टूटेगा तो ही लोकातीत, भवातीत, इंद्रियातीत परम शांति की उपलब्धि होगी। इसी हेतु भगवान ने विपश्यना की कल्याणकारिणी साधना सिखाई।

इसी ओर इंगित करते हुए भगवान ने चार चरण की उपरोक्त गाथा सुन कर उसके चौथे चरण को बदलते हुए कहा -
लोक मिसं पजहे सन्तिपेक्खो- परम शांति की अपेक्षा रखने वाले को चाहिए कि वह  लोकिय सुख की अभीप्सा त्यागे।।
विपश्यना साधना के गहन अभ्यास से ही यह अभीप्सा छूटती है। यह अभ्यास करते हुए साधक को सामने आ रही मृत्यु के प्रति सजगता अवश्य बनाये रखनी चाहिए, परंतु मृत्यु का भय रंचमात्र भी न रहे। मृत्यु चाहे जब आये, हमें प्रसन्न चित्त से उसके लिए सतत तैयार रहना चाहिए।
विपश्यी साधक को जीवन के किसी भी जन्म-दिवस के पड़ाव पर एक दृष्टि अतीत पर डाल कर अवश्य देख लेना चाहिए। अब तक के जीवन में जो भूलें हुई हैं, वह भविष्य में न हों, इसका पुनः दृढ़ संकल्प कर लेना चाहिए। जो सत्कर्म अब तक किये हैं, उन्हें शेष जीवन में भी करते रहने के लिए कृतसंकल्प हो जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण सत्कर्म तो मुक्तिदायिनी भगवती विपश्यना का अभ्यास ही है। वह छूटने न पाये । सतत चलता रहे।
आज के अभ्यास को कल पर न टालें। भगवान के यह बोल कानों में सदा चेतावनी की तरह गूंजते रहें -
अज्जेव किच्चमातप्पं -तपने का काम आज ही करो।[उसे कल पर मत टालो ।]
कोज मरणं सुवे - कौन जाने कल सुबह ही मरना हो ।

मृत्यु को आमंत्रित करने की आवश्यकता नहीं है, परंतु वह आती है तो उससे भयभीत होने की भी आवश्यकता नहीं है। हम उसके लिए हर समय तैयार रहें। हमें समय-समय पर मरणानुसति का अभ्यास करते रहना चाहिए। मैंने अपने अनुभव से देखा है कि यह अत्यंत लाभदायी होता है। ऐसा करते हुए कभी-कभी अपने मानस की जांच कर देख लेना चाहिए कि यदि कल सुबह ही मृत्यु होगी, तो इस जीवन के अंतिम क्षण की कैसी अवस्था होगी? क्या कोई अभीप्सा तो साथ नहीं लगी रहेगी, भले ही वह धर्म-कार्य पूरा करने की ही अभीप्सा क्यों न हो ? अथवा जब कभी कोई भावावेश का संस्कार मन में जागे, तो तुरंत मरणानुसति करते हुए देखना चाहिए कि यदि अगले ही क्षण मेरी मृत्यु हो जाय, तो यह भावावेश इस भव-धारा को कैसा भयावह मोड़ दे देगा? यह होश जागते ही भावावेश से छुटकारा पाना आसान हो जाता है।

समय-समय पर मृत्यु का रिहर्सल करने का एक लाभ यह भी होता है। मानस यह सोचता है, न जाने कितने जन्मों से भव-संसरण करते आ रहा हूं। इस बार किसी पुण्य के कारण मानव क अनमोल जीवन मिला है। शुद्ध धर्म से संसर्ग हुआ है। थोथे कर्मकांडों और निकम्मी, निरर्थक दार्शनिक मान्यताओं से तथा सांप्रदायिक बाड़े-बंदी से मुक्त, शुद्ध धर्म के प्रति श्रद्धा जागी है। तो इससे मैंने क्या लाभ उठाया है? इसका लेखा-जोखा सामने आता है, तो जो कमी रह गई, उसे पूरा करने का उत्साह जागता है। मृत्यु कल सुबह ही आयेगी या सौ शरद पूरे करके आयेगी, मैं नहीं जानता। परंतु जितने दिन जीना है, बड़े प्रसन्न चित्त से अपनी पुण्य-पारमिताओं को पूरा करने में लगा रहूं और मानवी जीवन को सार्थक बना लें। परिणाम जो आये सो आये, जब आये तब आये। उसे धर्म पर छोडूं। अपनी ओर से यथाशक्ति इस महत्वपूर्ण जीवन के बचे हुए समय का अच्छे से अच्छा सदुपयोग करता रहूं। इस निमित्त प्रेरणामयी भगवद्-वाणी का यह उद्बोधन सदा साथ रहे -

उत्तिट्टे नप्पमज्जेय्य धम्मं सुचरितं चरे ॥ -उठो, बिना प्रमाद के भली प्रकार धर्माचरण में लग जाओ।
और लगा ही रहूं धर्माचरण में। परिणाम स्वतः मंगलमय आयेंगे।
मंगलमित्र, 
सत्य नारायण गोयन्का 

फ़रवरी 1994 हिंदी विपश्यना पत्रिका में प्रकाशित
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🌷Seventy Years Have Been Completed 🌷 
                         -S. N. Goenka.

My life has seen seventy autumns. And who knows how many more are left? How can the ones that are left be best used? May this awareness be maintained.

On this occasion some beneficial words of the Buddha come to mind. 

🌷The incident is of Sāvatthi, in Anāthapinḍika's Jetavanārama. It is night-time. A devaputta has come to meet the Buddha. He expresses his thoughts to the Buddha in the form of a gāthā of four lines—

Accenti kālā, tarayanti rattiyo
—Time is passing, nights are passing.

Vayoguṇā anupubbaṃ jahanti
—Life is gradually coming to an end.

Etaṃ bhayaṃ maraṇe pekkhamāno
—Observing the fear of (approaching) death

Puññāni kayirātha sukhāvahāni
—Perform meritorious deeds that yield pleasant fruits.

Someone has rightly said,

"Morning comes, evening comes,
Thus the end of life comes."

🌷Do not let this priceless human life end in vain. 

Even if it is only out of fear of the approaching death, be engaged in meritorious deeds that yield pleasant fruit. If we perform unwholesome deeds, they will result in suffering for us. If we perform wholesome deeds, they will result in happiness for us. This is the unbreakable law of nature. Therefore it is better to do wholesome deeds rather than unwholesome deeds in order to avoid suffering and to enjoy happiness.

We do not know how long we have been crushed under the everchanging wheel of existence of worldly happiness and suffering, and for how long this wheel of worldly happiness and suffering will continue in the future. 

The Buddha discovered a simple and direct path to full liberation from this wheel of existence. He made it easily accessible to all. He taught the liberation-endowing technique of Vipassana to the people, by the practice of which they could be liberated from the wheel of existence and attain the eternal, unchanging nibbānaṃ paramamaṃ sukhaṃ meaning the ultimate happiness, the ultimate peace of nibbāna, which is much superior to worldly pleasures. 

But this is possible only after the habit of heedlessly running after the enjoyment of worldly sensual pleasures is broken. And this is just what Vipassana enables us to do. It breaks the habit pattern of multiplication of the saṅkhāras of craving and aversion which lie in the depth of the subconscious mind. It digs out the saṅkhāras of craving for pleasure and aversion towards suffering. It eradicates the longstanding habit of blind reaction. As long as craving for worldly pleasures remains, aversion will continue to arise towards worldly suffering and because of these two, the wheel of existence will continue to roll. Only when the wheel of existence breaks, can ultimate peace, which is supramundane, beyond the worlds, beyond the round of existence, beyond the field of senses, be attained. It was with this purpose that the Buddha taught the beneficial technique of Vipassana.

Hinting at this, upon hearing the above gāthā of four lines, the Buddha, changing its fourth line, said—

Lokāmisaṃ pajahe santipekkho
—One who hopes for the ultimate peace should give up the desire for worldly happiness.

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Only by the intensive practice of Vipassana can one eradicate this worldly desire. While practising Vipassana, a meditator should maintain awareness of one's impending death, but there should not be a trace of fear of death. Whenever death comes, one should be constantly prepared for it with a tranquil mind.

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🌷On the occasion of every birthday, 

a Vipassana meditator should certainly look back at the past. He should make a firm resolution that he will not repeat the mistakes he has commited in the past and that he will continue to perform whatever wholesome deeds he has done until now for the rest of his life. The most important wholesome deed of all is the practice of the liberating technique of Vipassana. This should not be neglected; it should be diligently practised. Do not postpone today's practice till tomorrow. Let these words of the Buddha constantly echo in your ears like a warning—

Ajjeva kiccamātappaṃ
—Perform the work of meditation today itself. (Do not postpone it till tomorrow.)

Kojaññā maraṇaṃ suve
—Who knows, death may come tomorrow.

It is not necessary to invite death, but when it comes, there is no need to be afraid of it. Let us be prepared for it every moment.

From time to time we should practise maraṇānusati (contemplation about death). I have seen from my own experience that this is very beneficial. Sometimes while doing this, one should examine one's own mind, "If I die tomorrow morning, what will be the state of the last moment of this life? Will any longing remain, even though this desire may be to complete some Dhamma mission? Whenever the saṅkhāra of some excessive emotion arises in the mind, we should immediately practise maraṇānusati and understand that, "If I die in the very next moment, what fearful direction will this excessive emotion give to this stream of becoming?" As soon as this awareness arises, it becomes easy for one to be liberated from this excessive emotion.

There is one more advantage of maraṇānusati from time to time. The mind thinks, "Who knows how many lives I have been rolling in the cycle of existence? This time, as a result of some wholesome deed, I have obtained the invaluable life of a human being. I have come in contact with pure Dhamma. I have developed faith in pure Dhamma, which is free from meaningless rituals and philosophies as well as from sectarian barriers. What benefit have I derived from this?" 

When one makes an assessment of this, whatever shortcomings remain, one develops enthusiasm to correct them. Whether death will come tomorrow morning or after a hundred autumns, I do not know. But no matter how many days I have to live, I will use them to perfect my pāramitās with a contented mind and make my human life meaningful. Whatever results come, let them come; whenever they come, let them come then. I leave that to Dhamma. On my part, let me continue to keep making the best use of the remaining time of this important life to the best of my ability.

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🌷For this purpose, let these inspiring words of the Buddha be with us—

Uttiṭṭhe nappamajjeyya dhammaṃ sucaritaṃ care.
—Arise! live the Dhamma life with diligence.

May I keep living the life of Dhamma. The results will naturally be beneficial.

Thursday, 7 June 2018

The best way to serve people is to generate as much love and compassion as possible

The best way to serve people is to generate as much love and compassion as possible, and dissolve your ego as much as possible. This is not only in the students' interest, it is in your interest also. If you build your ego as you serve people, you have started to harm yourself in the name of Dhamma, in the name of serving others. One who cannot help oneself can never help others.


At the start of one or two of the centres there was a tussle between the assistant teachers and the management or trustees. That fire started, but soon it was extinguished; now don't repeat that bad example here. From the beginning make sure that there is no fire; only cordiality and goodwill should prevail ~ SNG @ Benefit of Many!!!

Wednesday, 23 May 2018

पश्यना: कल्याण का मार्ग🌷

पश्यना: कल्याण का मार्ग🌷

हम अनुभव करते हैं की हमारे जीवन में कितना तनाव है, खिंचाव है, बेचैनी है, अशांति है, व्याकुलता है।

हमारे पास सब साधन हो, संपत्ति हो तो भी हम दुखी रहतें हैं। इनका अभाव है तो दुखी हैं ही।

मन का यह रोग सार्वजनीन है, सार्वकालिक है, सार्वदेशिक है।

🌻यदि हम मन के इस रोग का कारण जान लें तो इसे दूर अवश्य कर सकेंगे।

रोग का कारण मन के विकार है।

यदि हमारा मन इन विकारो से मुक्त हो जाये, शुद्ध हो जाये, निर्मल हो जाये तो हम दुःख से, अशांति से, बेचैनी से अपने आप दूर हो जायेंगे।

🍁चित्त के निर्मल होने पर किसी के प्रति ईर्ष्या या द्वेष नही जागेगा।

निर्मल चित्त प्यार से, करुणा से, मुदिता से, समता से भर-भर उठेगा। हमारा मन सदा संतुलित रहेगा।

यही कल्याण का मार्ग है।

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Ahuja
Balaji Tours
9422421700

Sunday, 20 May 2018

"सही माने में सुखी सुरक्षित

🌷"सही माने में सुखी सुरक्षित"🌷

एक व्यक्ति धन- सम्पति संग्रह कर आसक्त(attachment) होता है। सोचता है, इनके सहारे मेरा भविष्य सुरक्षित रहेगा। अनागत काल(future) में मुझे कोई कष्ट नही होगा।

एक व्यक्ति पुत्र-कलत्र, बंधू- बांधव संग्रह कर आसक्त होता है। सोचता है इनके सहारे मेरा अनिष्ट नही होगा। संकट में भाई शरण देगा, पुत्र रक्षा करेगा।

लेकिन जब दिन पलटते हैं तो अपने को असहाय पाता है। न संग्रहित धन काम आता है, न पुत्र, बंधू रक्षा कर पाते हैं। 

अपने कर्म- संस्कारो का दुखद प्रतिफल स्वयं ही भुगतना पड़ता है। किंचित भी सुखी नही रह पाता।

🌷 एक व्यक्ति धर्मपूर्वक परिवार पोषण करता हुआ शील का पालन करता है, समाधि का अभ्यास करता है, प्रज्ञा में स्थित होता है, विपश्यना साधना द्वारा राग, द्वेष और मोह का संवर करता है, और इस प्रकार धर्म संग्रह करता है, धर्म की शरण जाता है। उसके भी कभी दिन पलटते है, पूर्व के दूषित कर्मो के दुखद फल आते हैं।न धन काम आता है, न भाई साथ देता है, न पुत्र रक्षा करता है। 

परंतु संग्रह किया हुआ धर्म सहायक बनता है,  आचरण द्वारा रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है। धर्म धैर्य के साथ संकट का सामना करता है। बुरे दिन देर तक टिक नही पाते। खोया हुआ धन लौट आता है, आँख बदले हुए भाई बंधु फिर मिल जाते हैं।मुँह फेरे हुए पुत्र फिर आज्ञाकारी हो जाते हैं। सारा वातावरण अनुकूल हो जाता है।

 ऐसा व्यक्ति सही माने में सुखी सुरक्षित रहता है...इस लोक में भी, परलोक में भी और सारे लोको के परे भी।


मेरे मन में तो कई तरह के विचार आतें हैं, पर न तो कुछ मै बोलता हूँ न ही ऐसा वैसा कुछ करता हूँ। क्या तब भी मेरे कुछ कर्मसंस्कार बनेंगे?

🌷 Questions: मेरे मन में तो कई तरह के विचार आतें हैं, पर न तो कुछ मै बोलता हूँ न ही ऐसा वैसा कुछ करता हूँ। क्या तब भी मेरे कुछ कर्मसंस्कार बनेंगे?

उत्तर--तेरे मन में विचार आए। अच्छे भी आ सकते हैं, बुरे भी आ सकते हैं।
अच्छे विचार आये और तूने वाणी और शरीर से अच्छे कर्म किये, तो ऐसे विचार वाणी और शरीर के कर्म पर प्रकट हुए। तो तेरा भी भला ओरो का भी भला।
तेरे मन में बहुत बुरे विचार आये, मैले विचार आये और तूने उसे वाणी पर नही उतरने दिया, शरीर के कर्म पर नही उतरने दिया, तो तूने किसी अन्य की हानि नहीं की, लेकिन तेरी हानि तो हुई ही।
तेरे तो कर्म संस्कार बने ही।

🌷 समझो ये कर्म संस्कार कैसे बने?

A )जो भी विचार तेरे मन में चल रहा है यदि वो आया और थोड़ी देर में निकल गया तो भी कर्म संस्कार बनेंगे पर पानी की लकीर जैसे बनेंगे। उनका कोई प्रभाव नही होगा। जैसे जैसे बनते गए, वैसे वैसे समाप्त होते गए।

B) यदि उसका चिंतन देर तक चलता रहा तो बालू की लकीर जैसे बनेंगे। वो भी समय पाकर समाप्त हो जाते हैं। वो इतने बलवान नही होते की हमें एक नया जन्म दे सके।

C) लेकिन जब वे ही विचार बार बार उत्पन्न होते हुए इतने गहरे हो जाएँ की जैसे पत्थर पर छेँनी और हथोड़े से गहरी लकीर कर दें, तो भले हमने वाणी से कुछ नहीं कहा, भले हमने शरीर से कोई ऐसा काम नहीं किया पर मन ही मन ये अवस्था पैदा कर ली की जैसे वाणी से दुष्कर्म करते हुए मन की क्या अवस्था होती, वैसी अवस्था हमने अख्तियार(acquire) कर ली।शरीर से दुष्कर्म करते हुए मन की क्या अवस्था होती वो हमने अख्तियार कर ली, और कर्म तो मन का ही होता है।
मन का कर्म ही फल देता है।
पत्थर की लकीर वाला जो कर्म होगा वो इतना गहरा होगा की उनमे से कोई न कोई मृत्यु के समय जागेगा और अगले जन्म का कारण बन जायेगा।
तो यह जो भव संसरण है, जन्म मरण का चक्कर है वह मन के इन पत्थर की लकीरो जैसे कर्म संस्कारो की वजह से चलायमान होता है।

इसलिए मन पर संयम रखना बहुत आवश्यक है।

Thursday, 17 May 2018

कोजागरी पूर्णिमा के महत्त्व के बारे में बताएं?

🌹गुरूजी आप उत्सवो को मनाने के बारे में इतनी अच्छी तरह समझाते हैं, आज कोजागरी पूर्णिमा के महत्त्व के बारे में बताएं?

उत्तर--पुराने जमाने में वर्षा ऋतू को यात्रा के अनुकूल नही मानते थे। तो भिक्षु, सन्यासी, मुनि एक ही स्थान पर, किसी विहार में बैठ कर अपना ध्यान करते।
वर्षा समाप्त होते ही बड़ा उत्सव मनाया जाता।अब जो अनाज उगाया था वह प्रकट हो रहा है। तो उसकी जो पूर्णिमा होती थी, उस दिन सारे लोग एकत्र होकर आठ शील का पालन करते थे, दान देते थे, साधना करते थे।
ध्यान करेंगे तो रातीन्दिवमत्न्दितो यानी रात और दिन का ध्यान होना चाहिये तो सारी रात जाग करके ध्यान करेंगे। यह जागरण तब से चला।

💐भिक्षुओ के लिये तो अनेक बार रात भर साधना करने का विधान है।पर गृहस्थ इतना कैसे करें? अतः एक दिन उनको ऐसा मिला की जिसमे वे एक बार भोजन करते हैं और बाकि समय रात- दिन केवल ध्यान करेंगे।रात भर जागते हुए ध्यान करेंगे तो यह जागरण की रात हुई। और जागरण का धर्म में इतना बड़ा महत्त्व है।
जागता हुआ भी ध्यान कर रहा है।और ध्यान कर रहा है तो सुबह उठेगा तो ऐसे फ्रेश होकर उठेगा जैसे खूब गहरी नींद सोकर उठा हो