Tuesday, 22 August 2017

किसी को मार देने से न मरने वाले का भला होता है, न अन्य लोगो का।

🌹गुरूजी- किसी को मार देने से न मरने वाले का भला होता है, न अन्य लोगो का। 

असली उद्धार तो उसको बदल देने में है।

उसको दानव से मानव बना देने में है। उसकी पैशाचिक वर्तियां नष्ट कर देने में है; और यह काम बड़ी असीम मैत्री और करुणा से ही हो सकता है।

🌻भगवान् बुद्ध ने मैत्री और करुणा के बल पर ही भूले भटके लोगों को सही मार्ग पर आ सकने में सहायता प्रदान की। उसे सदा के लिए जीत लिया।

जैसे अंगुलिमाल जो संत पुरुष होकर शुद्ध चित्त से लोगों की सेवा में लग गया। सही माने में उसका उद्धार हुआ।

हिंसा से हिंसा पर विजय नहीं पायी जा सकती। वैर से वैर पर विजय नहीं पायी जा सकती। 

अहिंसा और मैत्री से ही हिंसा और वैर को जीता जा सकता है।

🌷 प्यार और करुणा द्वारा किसी बुरे की बुराई को जीतने का प्रयत्न करते रहे। यह प्रयत्न तभी सफल हो सकता है जब हम अपने अंतर्मन की गंदगिओं को दूर करके उसे स्वच्छ और निर्मल बना लें।

🍁विपश्यना के सतत अभ्यास द्वारा आत्मविजयी बने, तृष्णा को जड़ से उखाड़ फेंके, आसक्तियों के बंधन से मुक्त हो जाएँ। इसी में हमारा मंगल है, कल्याण है, भला है।

गुरूजी--गृहस्थो के लिये सतरहवां मंगल धर्म है- अनवज्जानी कम्मानि यानी वही कर्म करें जो वर्जित नही हैं।

गुरूजी--गृहस्थो के लिये सतरहवां मंगल धर्म है- अनवज्जानी कम्मानि
यानी वही कर्म करें जो वर्जित नही हैं।

जो कर्म वर्जित हैं, जिनको करना मना  है, उन्हें कदापि नही करें।

🌷एक गृहस्थ ऐसा कोई व्यापार-व्यवसाय ना करे जिससे अन्य लोगो को दुराचार का जीवन जीने में बढ़ावा मिलता हो, प्रोत्साहन मिलता हो, सहायता मिलती हो।

इसलिये भगवान ने कुछ व्यवसायों को वर्जित बताया।

सद्गृहस्थ के लिये ऐसे व्यवसाय करने की मनाही की--

(1)नशीले पदार्थो का व्यवसाय
(2)शस्त्रो का व्यवसाय
(3)प्राणियों के क्रय-विक्रय का व्यवसाय
(4)मांस का व्यवसाय
(5)जहर का व्यवसाय

(6)धर्म का व्यवसाय--धर्म को धन कमाने का माध्यम न बना लें।
इससे धर्म का विनाश होता है।
धर्म शिक्षक की चेतना मलिन हो जाती है, और सिखने वालो की भी।

धर्म शिक्षा का लक्ष्य लोक कल्याण ही हो।

🌺धर्म तभी शुद्ध रहता है जबकि उसे बिना बदले में कुछ पाने की भावना के साथ निस्वार्थ भाव से बांटा जाए।

धन कमाने का लक्ष्य हो जाने से धर्म दूषित हो जाता है।

Question: What’s the best way to work with gross physical sensations such as injury or illness in daily life?

Question: What's the best way to work with gross physical sensations such as injury or illness in daily life?

Goenkaji: Now there is a big storm—you have suffered an injury. 

If you observe your sensations, your mind becomes equanimous. 

You take all important steps to cure your injury or illness; you go to the doctor or hospital. 

But at the same time your mind is equanimous because you are with the sensation. 

Then you find the treatment works better, quicker. 

🌷 If your mind is agitated, the treatment takes a long time because it has become mental agony rather than just physical agony.

Q: How can the mind remain balanced when we are in pain?

#vipassana #meditation #sngoenka

Q: How can the mind remain balanced when we are in pain?

A: Whenever something happens in the external world that we do not like, there are unpleasant sensations in the body. 

A Vipassana meditator focuses the entire attention on these sensations without reacting, just observing them very objectively. 

It is very difficult in the beginning, but slowly it becomes easier to observe the gross unpleasant sensations - what we call pain - with a balanced, calm mind. 

🌷 Pleasant, unpleasant, makes no difference. 

Every sensation arises only to pass away. 

Why react to something that is so ephemeral.

क्षमा किये सुख ही बढे है प्रत्यक्ष प्रमाण।।


क्रोध क्षोभ का मूल है
क्षांति शांति की खान।
क्रोध छोड़ धारे क्षमा
तो होवे कल्याण।।

क्रोध किये दुख ही बढे
क्रोध न कर नादान।
क्षमा किये सुख ही बढे
है प्रत्यक्ष प्रमाण।।

Thursday, 10 August 2017

कुशल कर्म ही हमारा सही मंगल है।

"शुभ मुहर्त"

कुशल कर्म ही हमारा सही मंगल है। 

जब हम मन से, वाणी से या शरीर से कोई कुशल कर्म करते हैं तो प्रकर्ति के बंधे बंधाये अटूट नियमो के अनुसार उसके परिणाम स्वरुप देर सबेर कुशल परिणाम ही मिलते हैं।

🍁इसके विपरीत यदि हम अकुशल कर्म करें तो प्रकर्ति के अटूट नियमो के अनुसार उसके परिणाम अकुशल ही होते हैं। हमारा अमंगल ही होता है।

🌺 इसलिए धर्म को समझे, प्रकर्ति के नियमो को समझें।

जिस दिन, जिस क्षण, जिस मुहर्त में हमने शुभ कर्म किया वह हमारे लिये शुभ मुहर्त हो गया।

दुष्कर्म किया वह हमारे लिये अशुभ मुहर्त हो गया।

अतः महत्त्व अपने कर्मो को देना चाहिये। अपनी जीवनचर्या सुधारे। मंगल उसी में समाया हुआ है।